नवरात्री से जुडी हुई कुछ बातें Some things related to Navratri

नवरात्रि की प्रथम कथा : First story of Navratri

एक कथा के अनुसार लंका युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण-वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और विधि के अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ 108 नीलकमल की व्यवस्था भी करा दी। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरत्व प्राप्त करने के लिए चंडी पाठ प्रारंभ कर दिया। यह बात पवन के माध्यम से इन्द्रदेव ने श्रीराम तक पहुँचवा दी। इधर रावण ने मायावी तरीक़े से पूजास्थल पर हवन सामग्री में से एक नीलकमल ग़ायब करा दिया जिससे श्रीराम की पूजा बाधित हो जाए। श्रीराम का संकल्प टूटता नज़र आया। सभी में इस बात का भय व्याप्त हो गया कि कहीं माँ दुर्गा कुपित न हो जाएँ। तभी श्रीराम को याद आया कि उन्हें ..कमल-नयन नवकंज लोचन.. भी कहा जाता है तो क्यों न एक नेत्र को वह माँ की पूजा में समर्पित कर दें। श्रीराम ने जैसे ही तूणीर से अपने नेत्र को निकालना चाहा तभी माँ दुर्गा प्रकट हुईं और कहा कि वह पूजा से प्रसन्न हुईं और उन्होंने विजयश्री का आशीर्वाद दिया। दूसरी तरफ़ रावण की पूजा के समय हनुमान जी ब्राह्मण बालक का रूप धरकर वहाँ पहुँच गए और पूजा कर रहे ब्राह्मणों से एक श्लोक ..जयादेवी..भूर्तिहरिणी.. में हरिणी के स्थान पर करिणी उच्चारित करा दिया। हरिणी का अर्थ होता है भक्त की पीड़ा हरने वाली और करिणी का अर्थ होता है पीड़ा देने वाली। इससे माँ दुर्गा रावण से नाराज़ हो गईं और रावण को श्राप दे दिया। रावण का सर्वनाश हो गया।

नवरात्रि की द्वितीय कथा : Second story of Navratri

एक अन्य कथा के अनुसार महिषासुर को उसकी उपासना से ख़ुश होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वर प्रदान कर दिया था। उस वरदान को पाकर महिषासुर ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और नरक को स्वर्ग के द्वार तक विस्तारित कर दिया। महिषासुर ने सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण और अन्य देवतओं के भी अधिकार छीन लिए और स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के भय से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था। तब महिषासुर के दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने माँ दुर्गा की रचना की। महिषासुर का वध करने के लिए देवताओं ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र माँ दुर्गा को समर्पित कर दिए थे जिससे वह बलवान हो गईं। नौ दिनों तक उनका महिषासुर से संग्राम चला था और अन्त में महिषासुर का वध करके माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी कहलाईं।

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वर्ष में दो बार नवरात्रि क्यों? : Why Navratri twice a year?

नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाने वाला इकलौता उत्सव है- एक नवरात्रि गर्मी की शुरुआत पर चैत्र में और दूसरा शीत की शुरुआत पर आश्विन माह में। गर्मी और जाड़े के मौसम में सौर-ऊर्जा हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है। क्योंकि फसल पकने, वर्षा जल के लिए बादल संघनित होने, ठंड से राहत देने आदि जैसे जीवनोपयोगी कार्य इस दौरान संपन्न होते हैं। इसलिए पवित्र शक्तियों की आराधना करने के लिए यह समय सबसे अच्छा माना जाता है। प्रकृति में बदलाव के कारण हमारे तन-मन और मस्तिष्क में भी बदलाव आते हैं। इसलिए शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए हम उपवास रखकर शक्ति की पूजा करते हैं। एक बार इसे सत्य और धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है, वहीं दूसरी बार इसे भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

नवरात्रि के नौ दिन – Nine days of Navratri
-पहला दिन : शैलपुत्री
-दूसरा दिन : ब्रह्मचारिणी
-तीसरा दिन : चंद्रघंटा
-चौथा दिन : कुष्मांडा
-पांचवा दिन : स्कंदमाता
-छटवां दिन : कात्यायनी
-सातवां दिन : कालरात्रि
-आठवां दिन : महागौरी
-नौवां दिन : सिद्धिदात्री

क्यों हैं माँ दुर्गा के नौ रूप : Why are there nine forms of Maa Durga

यह भौतिक नहीं, बल्कि लोक से परे आलौकिक रूप है, सूक्ष्म तरह से, सूक्ष्म रूप। इसकी अनुभूति के लिये पहला कदम ध्यान में बैठना है। ध्यान में आप ब्रह्मांड को अनुभव करते हैं। इसीलिये बुद्ध ने कहा है, आप बस देवियों के विषय में बात ही करते हैं, जरा बैठिये और ध्यान करिये। ईश्वर के विषय में न सोचिये। शून्यता में जाईये, अपने भीतर। एक बार आप वहां पहुँच गये, तो अगला कदम वो है, जहां आपको विभिन्न मन्त्र, विभिन्न शक्तियाँ दिखाई देंगी, वो सभी जागृत होंगी। बौद्ध मत में भी, वे इन सभी देवियों का पूजन करते हैं। इसलिये, यदि आप ध्यान कर रहे हैं, तो सभी यज्ञ, सभी पूजन अधिक प्रभावी हो जायेंगे। नहीं तो उनका इतना प्रभाव नहीं होगा। यह ऐसे ही है, जैसे कि आप नल तो खोलते हैं, परन्तु गिलास कहीं और रखते हैं, नल के नीचे नहीं। पानी तो आता है, पर आपका गिलास खाली ही रह जाता है। या फिर आप अपने गिलास को उलटा पकड़े रहते हैं। 10 मिनट के बाद भी आप इसे हटायेंगे, तो इसमें पानी नहीं होगा। क्योंकि आपने इसे ठीक प्रकार से नहीं पकड़ा है।
सभी पूजन ध्यान के साथ शुरू होते हैं और हजारों वर्षों से इसी विधि का प्रयोग किया जाता है। ऐसा पवित्र आत्मा के सभी विविध तत्वों को जागृत करने के लिये, उनका आह्वाहन करने के लिये किया जाता था। हमारे भीतर एक आत्मा है। उस आत्मा की कई विविधतायें हैं, जिनके कई नाम, कई सूक्ष्म रूप हैं और नवरात्रि इन्हीं सब से जुड़े हैं – इन सब तत्वों का इस धरती पर आवाहन, जागरण और पूजन करना।

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नवरात्रि कब मनायी जाती है : When is Navratri celebrated

नवरात्रि प्रत्येक वर्ष शरद ऋतु में मनायी जाती है। वैसे तो वर्ष में कुल दो नवरात्रि पड़ती है लेकिन शरद ऋतु में मनायी जाने वाली नवरात्रि का बहुत ज्यादा महत्व होता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि अश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक मनायी जाती है। इसे शारदा नवरात्रि, शारदीय नवरात्र, आदिशक्ति दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। ग्रिगेरियन कैलेंडर के अनुसार शारदा नवरात्रि प्रत्येक वर्ष सितंबर या अक्टूबर माह में पड़ती है। जबकि चैत्र नवरात्र मार्च या अप्रैल में मनायी जाती है।

नवरात्रि क्यों मनायी जाती है – Why we celebrate Navratri

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नवरात्रि नौ दिनों का त्योहार है और इसे पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। हालांकि नवरात्रि मनाने के पीछे दो कहानियों का जिक्र किया जाता है। नवरात्रि को बुराई पर अच्छाई की विजय के रुप में भी मनाया जाता है। देश के उत्तरी और पश्चिमी भागों में मान्यता है कि राम ने रावण को हराकर विजय प्राप्त की थी। इसी उपलक्ष्य में नवरात्रि मनायी जाती है। पुराणों के अनुसार रावण जब माता सीता का हरण करके ले गया था तब भगवान राम ने रावण से युद्ध करके उसका वध कर दिया था। राम और रावण का अंतिम युद्ध दशमी के दिन हुआ था और उसी दिन रावण मारा गया था। नवरात्रि में नौ दिनों तक रामायण का पाठ किया जाता है और रामलीला का मंचन आयोजित होता है। दसवें दिन रावण का पुतला जलाकर दशहरा मनाया जाता है।
भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में नवरात्रि उत्सव का मुख्य कारण यह माना जाता है कि शेर पर सवार होकर महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था और देवताओं की रक्षा की थी। इसी के उपलक्ष्य में नवरात्रि मनायी जाती है और आदि शक्ति दुर्गा की नौ दिनों तक आराधना की जाती है।