Chandragupta Maurya In History In Hindi

महान योद्धा चन्द्रगुप्त मौर्या का जीवन परिचय ❋ Introduction of Great Warrior Chandragupta Maurya

भारतीय इतिहास Indian History को गौरवमयी बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान Significant contribution देने वाले मौर्या साम्राज्य के महान योद्धाओ में से एक महान योद्धा चन्द्रगुप्त मौर्या हैं  उनके अविश्वसनीय साहस और अपार शक्ति के गुणगान पुरे भारतीय इतिहास (Indian History) के पन्नो में आज भी स्वर्ण अक्षरों में रचित हैं | चन्द्रगुप्त मौर्या हिन्दुस्तानी इतिहास के सबसे महान और प्रसिद्ध शासक Famous ruler थे, जिसे आज कई सदियों बाद भी लोग याद करते हैं और उनकी प्रसंशा करते हैं | चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसवी बिहार (Bihar) पटना (Patna) जिले में हुआ था। जो उस समय के पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता है। वैसे तो भारत के इतिहास में इतने वीर और शूरवीर राजा हुए पर उनमें चंद्रगुप्त मौर्य का नाम सबसे ऊपर आता है क्योंकि चंद्रगुप्त मौर्य ने ना सिर्फ नंद शासन का अंत किया था बल्कि मगध में सारे भारत के राज्यों को मिलाने का भी एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया था पर चंद्रगुप्त मौर्य के साथ आचार्य चाणक्य का नाम भी मिलाया जाता है क्योंकि यह उनकी जो जीत थी उसमें चाणक्य का हाथ सबसे ज्यादा था।अपने अद्भुत साहस, कुशल रणनीति से न सिर्फ भारत बल्कि इसके आसपास के कई देशों पर भी राज किया था।

चन्द्रगुप्त मौर्य एक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने  संपूर्ण भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल रहे। महान पराक्रमी और शक्तिशाली चन्द्रगुप्त महान ने सिर्फ अपनी बदौलत भारत के अलग-अलग स्वतंत्र राज्यों को एक करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत देश में सभी को एकजुट कर एकता के सूत्र में बांधा। हालांकि, राज्यों को एकीकृत करने में सत्यपुत्र, चोल, कलिंग, चेरा और पंडया के तमिल क्षेत्रों को शामिल नहीं किया गया था।

चन्द्रगुप्त मौर्या की जीवनी और उपलब्धियां ❋ Biography and achievements of Chandragupta Maurya in Hindi

चन्द्रगुप्त मौर्य नन्दवंशीय शूद्र कुलोत्पन्न था । ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार वह नन्द राजा की शूद्र पत्नी से उत्पन्न हुआ था । बौद्ध साहित्य के अनुसार चन्द्रगुप्त ”मोरिय” नगर के राजा का पुत्र था । राजा की मृत्यु के बाद रानी ने उसे जन्म देकर पाटलिपुत्र की एक मवेशी शाला में फिकवा दिया था । चन्दन वृक्ष के द्वारा रक्षा किये जाने के कारण उसका नाम चन्द्रगुप्त पड़ा । बड़ा होकर जब वह मवेशी चराते हुए बालकों के साथ वहीं एक ऊंची पहाड़ी पर बैठकर राजा की तरह न्याय कर रहा था, तो नन्द से प्रतिशोध लेने को उतावले गुजरते हुए चाणक्य की नजर इस बालक पर पड़ी, तो उसने चन्द्रगुप्त को उसके पालनकर्ता शिकारी से खरीद लिया और तक्षशिला में समस्त प्रकार की शिक्षा दिलाकर उसे इस योग्य बनाया कि वह न केवल साम्राज्य का समूल नाश कर सके, वरन् मगध का शासक बन सके ।

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जैन साहित्य में चन्द्रगुप्त को मयूर पोषकों का पुत्र कहा गया है । कथासरित्सागर में उसे नन्दराज का पुत्र बताया गया है । चन्द्रगुप्त का शैशवकाल शिकारियों, चरवाहों के मध्य व्यतीत हुआ । उसने मगध के राजा के यहां नौकरी कर ली थी । अपनी योग्यता और प्रतिभा से वह मगध का सेनापति भी बन गया था । एक बार सिंहलगढ़ के राजा ने पिंजरे में बन्द एक मोम का सिंह राजा नन्द के यहां भेजते हुए यह चुनौती दी थी कि आपके राज्य का कोई व्यक्ति इसे पिंजरे का द्वार खोले बिना बाहर निकाल दे, तो मैं यह मान लूंगा कि आपके राज्य में भी कोई बुद्धिमान है । चन्द्रगुप्त ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए शलाका को तप्त करके सिंह को पिघला दिया । इस तरह स्वयं ही वह पिंजरे से बाहर हो गया ।

साम्राज्य का विस्तार ❋ Empire expansion in Hindi

उन ने अपने काल में बहुत ही ज्यादा मात्रा में युद्ध जीते और मगध साम्राज्य को एक बहुत ही धनवान राज्य के रूप में उभार दिया दरअसल चंद्रगुप्त मौर्य केवल और केवल चाणक्य को ही अपना गुरु मानते थे और उन्हीं के कहने पर सारी युद्ध की योजनाएं बनाया करते थे जो कि बिल्कुल सफल और सटीक बैठती थी चंद्रगुप्त मौर्य भारतवर्ष के इकलौते और इतने महान राजा थे जिन्होंने कभी भी किसी से भी कोई भी युद्ध में पराजय नहीं देखी। उन्होंने अपने जीवन काल में अपने साम्राज्य की बहुत विस्तार किया उन्होंने शुरुआत में अपने राज्य को आज के अफगानिस्तान से लेकर दक्कन हैदराबाद तक मिला दिया था फिर धीरे-धीरे उन्होंने अन्य भी युद्ध लड़ने शुरू किए और अपने साम्राज्य का और विस्तार किया।

पहले मगध पर नंद साम्राज्य का शासन स्थापित था तो वहां पर एक बहुत बड़ा भ्रम भूत हुआ चाणक्य उस समय तक सेना में एक अध्यापक के रूप में कार्य करते थे वहां पर अर्थशास्त्र और वेदों को पढ़ाते थे। और आचार्य चाणक्य एक ब्राह्मण थे तो वह मगध साम्राज्य में होने वाले ब्रह्मभोज के लिए वहां पर गए। चाणक्य दिखने में बहुत ही काले और एक कुरूप इंसान व्यक्ति थे तो जैसे ही वे खाने के लिए वहां पर बैठे तो वहां के राजा धनानंद जो कि बहुत ही घमंडी राजा था

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उसने उनका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। वह बोला कि अरे यह कैसा ब्राह्मण है यह तो किसी भी तरफ से ब्राह्मण नहीं लगता इसने बहुत ही भद्दे कपड़े पहन रखे हैं और यह बहुत ही कुरूप है। ये सुनकर सभी लोग बहुत बुरी तरह हंसने लगी और धनानंद भी हंसने लगा इसी पर चाणक्य वहां से उठ गए और राजा से अपने इस कृत्य के लिए माफी मांगने के लिए कहा पर धनानंद बहुत ही घटिया और एक घमंडी राजा था |

राजा अपनी प्रजा पर बहुत ही ज्यादा अत्याचार करता था उसने अपने राज्य में रोजमर्रा की चीजों पर भी कर लगा दिया था | जिससे उसकी खिलाफत होने लगी थी। पर मगध एक बहुत ही शक्तिशाली और ताकतवर राज्य था जिससे पूरे भारत के राज्य डरा करते थे। चाणक्य ने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए ठान लिया और वही राजा के सामने अपनी चुटिया खोल दी और कहा कि हे राजन जब तक मैं तुम्हारे इस नंद शासन का अंत नहीं कर देता मैं इस चुटिया को दोबारा नहीं बांधूंगा और यह कहकर वे वहां से निकल गए।

आचार्य चाणक्य राजा धनानंद से बदला लेने के लिए आतुर हो चुके थे। उन्होंने कसम खा ली थी कि मैं इस नंद शासन का अंत करके ही रहूंगा और धनानंद की मृत्यु के बाद ही इस चुटिया को बांध लूंगा। इसी सोच के साथ वे जंगल में निकल गए और अपने पास रखी कुछ सोने की मुद्राओं को उन्होंने गलाया और उससे बहुत ही ज्यादा मात्रा में सोने की मुद्राएं बना ली और एक पेड़ के नीचे उन्हें दफना दिया उन्होंने पहले तो धनानंद की एक सौतेले बेटे को राज्य का लालच देकर उसे अपनी तरफ कर लिया।

उसे ही शिक्षा देने लगे पर कुछ समय पश्चात उन्हें एक ऐसा लड़का दिखा जो कई लड़कों से अकेला ही युद्ध कर रहा था और वह उन लड़कों को युद्ध कला में हरा भी देता है। जो चाणक्य ने देखा और वह अचंभित हो गए और उन्हें लग गया कि यह कोई आम लड़का नहीं है यह एक बहुत ही शक्तिशाली और गुणवान व्यक्ति ही है। तो उन्होंने चंद्रगुप्त के बारे में पता किया तो वह उसकी हर एक बात पर नजर रखने लगे वह खेल खेल में ही कई सारे लड़कों की टोली का अकेला सरदार बन जाता था और युद्ध कला में बहुत ही निपुण था। तब उन्होंने उस लड़के का नाम पूछा उस लड़के ने अपना नाम चंद्रगुप्त बताया और इतिहासकारों के मुताबिक उसने कहा कि मेरे पिता एक राजा थे जिन्हें अब उस राज्य से बहिष्कृत कर दिया गया था। तो वह उनके साथ अब यहां रहता है और शिक्षा प्राप्त कर रहा है तो चाणक्य ने उससे कहा कि मैं तुम्हें एक राजा बनाऊंगा जो मगध साम्राज्य की गद्दी पर बैठेगा और समस्त भारत पर राज्य करेगा।

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आचार्य चाणक्य ने दोनों लड़कों को एक एक ताबीज धागे में पिरो कर दिया | और उसे गले में पहनने के आदेश दिए। दोनों लड़कों ने वैसा ही किया पहले उसने धनानंद के सौतेले लड़के के लिए आदेश दिया कि जाओ अभी चंद्रगुप्त सो रहा है और उसके गले से वह ताबीज इस तरह के निकाल के लाओ कि वह न तो जग पाए और ना ही उसे यह पता पड़ेगी उसके गले से ताबीज निकल रहा है और ना ही धागा काटा जाए। उस लड़के ने बहुत ही अधिक प्रयास किए पर वह बिल्कुल विफल रहा अब यही बात उसने चंद्रगुप्त मौर्य से कहीं जाओ चंद्रगुप्त जाकर उस लड़के के गले से ताबीज निकालकर लाओ ना तो वह लड़का जागना चाहिए और ना ही उस लड़के का धागा कटना चाहिए। तो चंद्रगुप्त से तलवार लेकर गया और उस लड़के की गर्दन काट दी और ताबीज लाकर आचार्य चाणक्य के हाथों में रख दिया। यह देखकर आचार्य चाणक समझ गए कि यह लड़का ही मगध की गद्दी पर बैठने का असली हकदार है क्योंकि यह मेरी बात भी मानता है और निर्णय भी झटपट ले लेता है।

 

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