सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन परिचय 💙Life introduction of Suryakant Tripathi ‘Nirala’ in Hindi

जीवन परिचय (1896-1961)

सन 1896 के फरवरी माह में पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल गांव में जाने माने साहित्यकार श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जन्म हुआ था उनका पितृ ग्राम  उत्तर प्रदेश के गढ़कोला  (उन्नाव) है| बचपन में उन्हें सूर्य कुमार के नाम से पुकारा जाता था| जब उनकी उम्र छोटी थी तभी उनकी मां का स्वर्गवास हो गया था |स्कूली शिक्षा के नाम पर इनमें केवल नौवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की थी| इनका साहित्य और संगीत में अपार रुझान इनकी पत्नी की प्रेरणा के स्वरूप हुआ था| 1918 में निराला जी की पत्नी का देहांत हो गया था|  दुर्भाग्यवश उनके पिता, चाचा, चचेरे भाई एक-एक कर मृत्यु को प्राप्त हो गए| सबसे अधिक निराला जी तब आहत हुए जब उनकी पुत्री सरोज की मृत्यु हो गई अपने संपूर्ण जीवन में निराला जी ने मृत्यु का जैसा साक्षात्कार किया था उसकी अभिव्यक्ति उनकी कई कविताओं में दिखाई देती है|

 कार्य क्षेत्र

निराला जी को सर्वाधिक प्रसिद्ध सन 1916 में मिली जब उन्होंने प्रसिद्ध कविता जूही की कली को रचा तब से मुक्त छंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं सन 1922 में वे रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका समन्वय के संपादन से जुड़ गए थे निराला जी 1923 से लेकर 1924 में मतवाला के संपादक मंडल में भी शामिल हुए थे सारे जीवन आर्थिक परेशानियों तो भोगते रहे साथ ही पारिवारिक सुख से भी वंचित होते रहे वह स्थाई रूप से कहीं भी कार्य नहीं कर सके क्योंकि वे एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे और अपने व्यक्तित्व से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं कर सकते थे अंत में इलाहाबाद आ कर रहे और सन 1961 में उनका देहावसान हो गया|

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छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदता वादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ निराला का काव्य संसार बहुत व्यापक है उनमें भारतीय इतिहास दर्शन और परंपरा को समझने की अपार क्षमता है और समकालीन जीवन के यथार्थ के विभिन्न पक्षों का चित्रण भी मिलता है निराला जैसी भावों और विचारों की विविधता और गहराई उनकी कविताओं से मिलती है वैसे ही बहुत कम कवियों में है उन्होंने भारतीय प्रकृति और संस्कृति के विभिन्न रूपों को गंभीर चित्रण अपने काव्य में किया है वह भारतीय किसान के संघर्षपूर्ण जीवन से बड़े प्रभावित थे अतः उनका यह लगाव उनकी अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है वैसे तो निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं किंतु फिर भी उन्होंने छंदों में भी कविताएं लिखी हैं उनके काव्य संसार में काव्य रूपों को की विविधता है जहां उन्होंने राम की भक्ति पूजा और तुलसीदास जैसी निर्मित वक्त कविताएं रची तो दूसरी प्रगीतो की भी रचना की हिंदी भाषा में उन्होंने गज़ले लिखी उन्होंने अपनी कविताओं में सामाजिक कुरीतियों को व्यंग के रूप में कई जगहों पर उकेरा है

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कृतिया व रचनाए

निराला की काव्य भाषा के अनेक रूप हैं और अनेक करें जहां राम की भक्ति पूजा और तुलसीदास में तत्सम प्रधान पदावली है तो भिक्षुक जैसी कविता में बोल चाल की भाषा क्रश अनुपात में प्रयोग किया गया है भाषा का उचित प्रयोग शब्दों की मितव्ययिता और अर्थ की प्रधानता उनकी काव्य भाषा की जानी पहचानी विशेषताएं हैं

निराला के प्रमुख काव्य कृतियां:-   परिमल,  गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीत गूंज आदि|

उपन्यास:-  अरावली, बिल्लेसुर बकरीहा और रतिनाथ की चाची उनका संपूर्ण साहित्य निराला प्रश्नावली के आठ खंडों में प्रकाशित हो चुका है|

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काव्य की पुरानी परंपराओं को त्यागकर का विश्व के स्तर पर भी विद्रोही तेवर अपनाते हुए निराला जी ने काव्य शैली को नई दिशा प्रदान की उनके काव्य में भाषा का कसाब शब्दों की मित्रता एवं अर्थ की प्रधानता है सांस्कृतिक तत्सम शब्दों के साथ ही संयुक्त शब्दों का प्रयोग निराला जी ने किया है निराला जी काव्य के प्रवर्तक माने जाते हैं उन्होंने ही सर्वप्रथम कविता को छंदों के बंधन से मुक्त करने का साहस किया यद्यपि उन्होंने चंद्र कविताएं भी लिखी है उर्दू में प्रचलित का प्रयोग करने वाला जिनी हिंदी में गधों की रचना भी की है