वैष्णो देवी माता के मंदिर की कहानी हमारी ज़ुबानी The story of the temple of Mata Vaishno Devi

वैष्णोदेवी का मंदिर या भवन Vaishnodevi temple or building

वैष्णोदेवी का मंदिर या भवन (Temple or building), कटरा (katra) से १३.५ किमी (13.5 km) की दूरी पर स्थित है, जो कि जम्मू जिले (Jammu district) में जम्मू शहर से लगभग ५० किमी (50 km) दूर स्थित एक कस्बा (Town) है। मंदिर तक जाने की यात्रा (Travel) इसी कस्बे से शुरू होती है। कटरा से पर्वत पर चढ़ाई (Mountain climbing) करने हेतु पदयात्रा (Hiking) के अलावा, मंदिर तक जाने के लिए पालकियाँ, खच्चर (mule) तथा विद्युत-चालित वाहन (Electric vehicle) भी मौजूद होते हैं। इसके अलावा कटरा से साँझीछत (Twilight), जोकि भवन से ९.५ किमी (9.5 km) दूर अवस्थित है, तक जाने हेतु हेलीकॉप्टर सेवा भी मौजूद है। कटरा नगर, जम्मू से सड़कमार्ग (Roadway) द्वारा जुड़ा है। पूर्वतः रेलवे की मदद से केवल जम्मू तक पहुंच पाना संभव था, परन्तु वर्ष २०१४ (2014) में कटरा को जम्मू-बारामूला रेलमार्ग (Jammu-Baramulla Railroad) से श्री माता वैष्णो देवी कटरा रेलवे स्टेशन के ज़रिए जोड़ दिया गया, जिसके बाद सीधे कटरा तक रेलमार्ग द्वारा पहुँच पाना संभव है। गर्मियों (Summer) में तीर्थयात्रियों (Pilgrims) की संख्या में अचानक वृद्धि के मद्देनज़र (View of growth) अक्सर रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष दिल्ली से कटरा के लिए विशेष ट्रेनें भी चलाई जाती हैं।

वैष्णो माता के मंदिर की कहानी Story of Mata Vaishno Devi temple

यह माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण करीबन 700 साल पहले पंडित श्रीधर द्वारा हुआ था, जो एक ब्राह्मण पुजारी थे जिन्हें लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं People helped him that’s not enough मां के प्रति सच्ची श्रद्धा भक्ति थी जबकि वह गरीब थे। उनका सपना था कि वह एक दिन भंडारा (व्यक्तियों के समूह के लिए भोजन की आपूर्ति) करें, मां वैष्णो देवी को समर्पित भंडारे के लिए एक शुभ दिन तय किया गया और श्रीधर ने आस पास के सभी गांव वालो को प्रसाद ग्रहण (Eclipse) करने का न्योता दिया। भंडारे वाले दिन पुनः श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बना कर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि (Because) मेहमान बहुत ज्यादा थे। जैसे-जैसे भंडार का दिन नजदीक आता जा रहा था, पंडित श्रीधर की मुसीबतें भी बढ़ती जा रही थी।

भगवान की कृपा से by the grace of God

वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे,इतनी कम सामग्री (material) और इतनी कम जगह दोनों ही समस्या थी। वह सुबह तक समस्याओं (problems) से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए,दोपहर तक मेहमान (Guest) आना शुरू हो गए थे श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी से कुटिया (Little hut) में आसानी से बैठ गए और अभी भी काफी जगह बाकी थी। श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी (The hut) से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट (Delicious) भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था।

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मां की गुफा की तलाश में Looking for mother’s cave

भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक (Eager) थे, पर वैष्णवी गायब (missing) हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट (clear) हुआ कि वह मां वैष्णो देवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे सनसनी गुफा (Sensation cave) के बारे बताया और चार बेटों के वरदान (Boon of four sons) के साथ उसे आशीर्वाद (blessings) दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े, जब उन्हें वह गुफा मिली तो उसने तय किया की वह अपना सारा जीवन मां की सेवा करेंगे। जल्द ही पवित्र गुफा प्रसिद्ध (Holy Cave Famous) हो गई और भक्त झुंड में मां के प्रति आस्था प्रकट करने आने लगे।

कैसे हुआ वैष्णो देवी का जन्म : How Mata Vaishno Devi was born

देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में ही माना जाता है जिसे राक्षस महिषासुर (Slaying demon Mahishasura) का वध करने के लिए जन्म दिया गया था और यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है l पौराणिक कथाओं (Mythology के अनुसार देवताओं को भगा कर महिषासुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था तब सभी देवता मिलकर त्रिमूर्ती के पास गए थे l ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली l इसीलिए दुर्गा को शक्ति भी कहा जाता है l दुर्गा की छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ थे l क्योंकि सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें शक्ति दी इसलिए वो सबसे ताकतवर भगवान मानी जाती हैं l उन्हें शिव का त्रिशूल मिला, विष्णु का चक्र, बह्मा का कमल, वायु देव से उन्हें नाक मिली, हिमावंत (पर्वतों के देवता) से कपड़े, धनुष और शेर मिला और ऐसे एक-एक कर शक्तियों से वो दुर्गा बनी और युद्ध के लिए तैयार हुईं l

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अर्धकुमारी गुफा का क्या है रहस्य ? Mystery of Ardhkuwari Cave ?

हिंदू धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों को ये तो पता ही होगा कि यहां इस धरती पर कुछ ऐसे चमत्कारी मंदिर है जिसका रहस्य आजतक कोई नहीं जान पाया। हालांकि भारत में आपको काफी धार्मिक (Religious) स्थल देखने को मिल जाएंगे। लेकिन आज हम बात करेंगे एक विशेष मंदिर की, वो है माता वैष्णो देवी, यह आपको भी पता होगा कि वैष्णो देवी का ये प्राचीन गुफा हमेशा से ही चर्चा का विषय बना रहा है। इस अर्धकुमारी गुफा Ardhkuwari Cave Temple के प्रति लोगों की आस्था कुछ ऐसी है कि हर साल भक्त माता के दर्शन (visit) करने हजारों की संख्या में पहुंचते हैं। हालांकि (Although) समय के साथ यहां माता के चरणों में आने वाले भक्तों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। भक्तों की सुरक्षा को देखते हुए माता की प्राचीन गुफा को आमतौर पर बंद रखा जाता है। इसकी जगह एक नई कृत्रिम (Artificial) गुफा बनाई गई है। इस गुफा का महात्तम बेहद (The greatest of all) ज्यादा है, क्योंकि इसमें कई सारे रहस्य (mystery) भी छिपे हुए हैं।

गर्भजून या अर्धकुमारी गुफा Womb or crescent cave

कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण (Construction of temple) कराने वाले करीब 700 साल पहले पंडित श्रीधर को बच्‍ची के रूप में प्रकट हुई माता ने स्‍वयं इस गुफा के बारे में बताया था। लेकिन कुछ किस्‍मत वालों को इस गुफा में प्रवेश का सौभाग्‍य मिल जाता है। श्रद्धालुओं की संख्‍या जब भी 10 हजार से कम होती है तो इस गुफा को खोल (Cave opened) दिया जाता है। वैसे इस गुफा को गर्भजून या अर्धकुमारी गुफा के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता (Recognition) है कि माता ने इस गुफा में नौ महीने बिताए थे, आप इसे वैसे ही समझ सकते हैं जैसे कोई शिशु जन्म से पहले मां के गर्भ में 9 माह तक रहता है यही कारण है कि इस गुफा को गर्भजून कहते हैं। गुफा का आकार एक माता के गर्भ के आकार (Womb size) जैसा ही है। छोटी-सी इस गुफा में से बड़े से बड़े आकार  (Size) का व्यक्ति बड़ी ही आसानी से निकल जाता है।

एक और मान्यता Another validation

इस गुफा की एक और मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति इस गुफा में केवल एक बार ही जा सकता है क्योंकि यदि कोई शिशु अपने मां के गर्भ से बाहर निकल जाता हैं तो वह दोबारा गर्भ (Pregnancy) में नहीं जा सकता हैं। भक्‍तों को इस गुफा के दर्शन करने की ललक रहती है। पर हर किसी को नहीं बल्कि कुछ क‌िस्मत वाले भक्तों को प्राचीन गुफा (Devotees Ancient Cave) से आज भी माता के भवन में प्रवेश का सौभाग्य म‌िल जाता है। दरअसल यह न‌ियम है क‌ि जब कभी भी दस हजार के कम श्रद्धालु (Faithful) होते हैं तब प्राचीन गुफा का द्वार खोल द‌िया जाता है।

भैरो मंदिर का इतिहास व् भैरों को वरदान Bhairon boon

आमतौर पर ऐसा शीत काल में द‌िसंबर और जनवरी (December and January) महीने में होता है। कहते हैं कि इस गुफा में आज भी भैरो का शरीर मौजूद (Bhairo’s body is present) है। कहा जाता है कि जब माता वैष्णो देवी भैरों को वरदान (Goddess Mata Vaishno Devi boon) दिया था कि कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। प्राचीन गुफा के समक्ष (Before) भैरो का शरीर मौजूद है और उसका सिर उडक़र तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी (The valley) में चला गया और शरीर यहां रह गया। जिस स्थान पर सिर गिरा, आज उस स्थान को ‘भैरोनाथ के मंदिर’ के नाम से जाना जाता है यही कारण है कि लोगों को इस मंदिर के दर्शन (visit) करने की ललक भी रहती है।

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काल भैरव की प्रतिमा के मदिरापान करने का रहस्य : The secret of drinking the idol of Kaal Bhairav

क्या मूर्ति मदिरापान (Idol drinking) कर सकती, आप कहेंगे नहीं, कतई नहीं। भला मूर्ति कैसे मदिरापान कर सकती है। मूर्ति तो बेजान होती है। बेजान चीजों को भूख-प्यास (Hunger and thirst) का अहसास (Realization) नहीं होता, इसलिए वह कुछ खाती-पीती भी नहीं है। लेकिन उज्जैन के काल भैरव के मंदिर में ऐसा नहीं होता। वाम मार्गी संप्रदाय (Denomination) के इस मंदिर में काल भैरव की मूर्ति को न सिर्फ मदिरा चढ़ाई जाती है, बल्कि बाबा भी मदिरापान करते हैं । आस्था (Faith) और अंधविश्वास (blind faith) की इस कड़ी में हमने इसी तथ्य को खंगालने (Douche) की कोशिश की। अपनी इस कोशिश के लिए हमने सबसे पहले रुख किया उज्जैन का महाकाल (Ujjain Mahakal ) के इस नगर को मंदिरों का नगर (City of temples) कहा जाता है। लेकिन हमारी मंजिल थी, एक विशेष मंदिर- काल भैरव मंदिर। यह मंदिर महाकाल से लगभग (approximately) पांच किलोमीटर की दूरी पर है। कुछ ही समय बाद हम मंदिर के मुख्य द्वार पर थे। मंदिर के बाहर सजी दुकानों (Laced shops) पर हमें फूल, प्रसाद, श्रीफल के साथ-साथ वाइन की छोटी-छोटी बोतलें भी सजी नजर आईं। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, जान पाते, उससे पहले ही हमारे सामने कुछ श्रद्धालुओं ने प्रसाद (Devotees offered) के साथ-साथ मदिरा की बोतलें भी खरीदीं। जब हमने दुकानदार रवि वर्मा से इस बारे में बातचीत की तो उन्होंने बताया कि बाबा के दर पर आने वाला हर भक्त उनको मदिरा (Wines) जरूर चढ़ाता है। बाबा के मुंह से मदिरा का कटोरा लगाने के बाद मदिरा धीरे-धीरे गायब हो जाती है।